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थानेदार-+घोलो थब्यासी महरी, रात को किप्त घक्त सोई थी हुम |
अब्बासी-हुजूर, फोई स्यारद्द बजे आँखें लगीं ।
धानेदार--एक-एक बोदी फड़कती है । साइव के सामने न इतता
खमकना !
ऋव्वासी--यह बातें में नहों समझती। चम्तकनावमटकता बात़ारी
आज़ाद-कथा ६१९
ओरतें जानें । हम हमेशा बेगमों में रहा किए हैं। यह इशारे कसी और
से कीजिए । बहुत थानेदारी के वर पर न रहिपुगा । देखा कि नऔरतें ही
औरत घर में हैं दो पेट से पाँव निकाले ।
थामेदार-तुम तो जामे से बाहर हुईं जाती हो ॥
वेगम्रसाहव कमरे से खड़ी काप रही थीं। ऐसा न हो, कीं मुझे देख
ले । थानेदार ते श्द्दासी से फिर कहा--म्पवा बयान लिखवाओ
' भ्रव्याप्ती--हम चारपाईं पर सो रहे थे कि एक बार आँख खुली ।
हमने सुराही से पानी उड़ेछा ओर वेगमलाहब को पिलाया ।
धानेदार--जों चाहो, लिखवा दो । तुम पर दरोग़हलूफ़ी का जुर्म
नहीं लग सकता ।
अव्यासी- क्या ईमान छोड़ना हे ? जो ठीक-ढीक है वह क्यों छिपाने ?
थानेदार--जवानी भी कैसी मस्त करनेवाली चीज़ होती है ।
श्रव्यासी ने अं गुकियाँ समटका-सटका कर थानेदार की इतनी खरी-खोदी
सुनाई कि थानेदारछाहब की शेखी क्षिरक्िरी हो गईं। दारोगासाहब से
ब्ोले--श्रापको किसी पर शक हो तो बयान कीजिए । वे भेदिएु के चोरी
नहीं हो सकती | दारोसा ने कहा--हमें क्रिसो पर शक नहीं । थानेदार
ने देखा कि यहाँ रग न जमेया तो छुपके से रुखखत हुए ।
. तिहत्तरवा परिच्लेद
खोजी श्राजाद के बाप बच गए तो उनकी दृज्जत होने छगी। तुकीं
कैदी हरदूस उनकी खिदमत करने को मुस्तैद रहते थे। एक दिन एुक
रूखी फौजी अफघर ने उनकी भ्रनोखी स्रत और माशे माशे-भर के हाथ-
पाँव देखे तो जी चाहा कि इनसे बातें, करे । एक : फारसीदाँ सुर्क को
सुतरज्जिम वनाकर ख्वाज्ञासाइब से यातें करने लगा। »
अफसर-शआप शआज़ाद पाशा के बाप है
खोजी*>बाप तो. क्या हूँ मगर खैर, बाप ही सम्किए | अ्द्र नो
तुम्हारे पजे में पड़कर छक्के छूट गए ।
अफसर-+थाप सी कभी किसी लड़ाई से शरीक हुए थे ?
खोजी--वाह, भोर जिन्दुगी-सर करता क्या रहा ? तुस-जैया गौश्ा
चझफ़पर आाज ही देखा | हमारा केडा हो गवाही देता है फि हम फौज
के जब्नान हैं। केंडे से नहीं पहचानते ? इसमें पछने की क्या जरूरत है।'
दुगलेवाली पलटन के रिस्ालदार थे। बाप एमसे पूछते हैं, कोई लड़ाई
देखी है ? जनाव यहाँ लह-वह लड़ाइयां देखी हैं कि आदमी वी भूख
प्यास बन्द हो जाय |
अफसर--अआएप गोली बला सकते हैं ?
खोजी--भजी एजरत, श्रय फ़स्द खुलवाहए | पूछते हैं गोली चला -
है। ज़रा सामने भरा जाइए सो बताऊे । एछ चार पुछ कुते से और हमसे
छाय-डाँद हो गई | खुदा की कसम, हमसे कुत्ता ग्यारह-घारद कदम पर
खड़ा था। धर के दागता हूँ तो पॉ-पों करता हुआ भरता गढ़ हुआ ।
अफ़्सर-श्रो हो ! आप सब योली चढाता है ।
खोजी-- भरती तुम हमको जवानी में देखते
अफसर ने इनकी बेतुकी धार्े सुनझर हुक्म दिया द्लि छोगाएी
बनन्‍्दुझ लाझो | तव तो म्रियाँ रोजी चकराए। सोचे कि धमारी सात
पीढियों तक तो किसी ने बन्दूक घडाई नहीं भीर न हमको याद छाता
है कि बन्ट्रक कमी उस्र-्मर छुईं भी दो, सगर इस वक्त तो आवर रखती
घाहिए। बोलें-“इस बन्दूक में गज़ तो महीं होता
अफुसर--टदती चिड़िया पर निशाना लगा सऊते हो ?
खोजी»उड़्ती चिढ़िया कैसी | घाससान तक के जानवरों को भून डा ।
आज़ादु-कथा ६२१
अफुपर- अच्छा तो वन्दूक के ।
,.. खोनी-ताकका निशाना छगारऊँ तो द्रख्त की पत्तियाँ गिरा हूं. ।
यह कहकर आप टहलने लगे |
शरऊफुपर--आप निशाना क्यों नहीं ऊूगाता ? इठाइए बन्दूक !
खोजी ने ज़मीन में खूब जोर से ठोकर मारी और एक ग़ज़ल गाने
(छगे। श्रफ़सर बिल में ख़ुब समझ रहा था कि यह स्ादमी महज ढोंयें
ससारना ज्ञानता हैं । बोला--अब वन्दूक छेसे हो या इसी बन्दूक से तुमको
। निशाना बनाऊँ ?
/ पैर, वडी देर तक दिल्लगी रही । भफुसर खोजी से इतना खुश हुआ
कि पहरेचाऊों को हुक्म दे दिया कि दृध पर बहुत सख्ती न करना । रात
को खोजी ने सोचा कि शब्र भागने की तदुवीर सोचनी चाहिए वरना
4 छडाईं खत्म हो जायगी और हम न इधर के रहेंगे न टघर के। झाधी
/ रात को उठे झोर खुदा से दुआ माँगने रूगे कि ऐ खुदा ! आज रात को
॥ है सुके इस केद से नज्ात दे । छुक्ों का छश्कर नज़र भाए और मैं गुल
। चाकर कहूँ कि हस था यहुँचे था पहुँचे। आ्राज़ाद से भी मुलाकात हो
ओर खुश-ख़ुश घतन चले । हू
यह छुभा सॉयकर खोजी रोने रूगे | हाय श्रव वंह दिन कहाँ नलीन
४ होंगे कि नवाबों के दरबार में गप उड़ा रहे हों। वह दिल्‍लगी, घढ
८ चदल अब नसीव हो छुकी । किस मजे से कटी जाती थी और किस
2 जत्फले गडेरियाँ चूसते थे । कोई खुटियाँ ख़रीदता 'है, कोई कतारे
४ जेकाता है । शोर-गुलू की यद्द कैफियत है कि कान पढी श्ावाज़ नहीं
सुनाई देती, सक्खियों की मिन-सरिंव एक तरफ, छिलकों का ढेर
दूसरी तरफ, कोई शोरत उण्डूखाने में त्रा गई तो ओर मी खुदल
होने छगी ।
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2 ७७0 आई 0७
दो बजे खोजी बाहर निकले तो उनको नज़र एक छोटे से व्टूद्ू ए
पडी । पहरेवाले सो रहे थे । खोजी व्ट्द्द के पास गए घौर उप्तकी गएः
पर हाथ फेरकर कहा--चेटा कहीं दुगा न देना । माना कि तुम छोटे पर
टटहू हो शोर ज्वाजासाइब का बोक तुमसे न उठ सक्ेग मगर दुछ एए|
नहीं, हिस्मते मरदाँ सददे खुदा । टट्दू को खोला और यस पर सदा
होकर भाहिस्ता-आहिस्ता कैम्प से वाहर की तरफ चले | बदन काँप शा ।
था मगर जब कोई सो फ़ुदम के फासिले पर निकल गए तो एक पवार हे
पुकारा--कौन जाता है ? खड़ा रह ! 5
सोजी--हम हैं जी माप्तक्ट, सरकारी धोष्ठी की घास छीलते हैं।
सवार-धच्छा तो चला जा ।
/ सोजी जब जरा हुर निकल आए तो दो चार यार ख़ब गुल संचायान
मार लिया सार लिया ! स्वाज्ासाहब दो करोड़ रूसियांँ मेंसे बेदा/
निकले आते हैं । छो भई तुकों गवाजाताहय था पहुँचे ।
अपनी फ़्तइ का दड़ा बज्ञांकर सोजी घोडे से उतरे अर पा
विछाकर सोए तो ऐसी मीठी नींद श्राई कि उदन्नन्भर न झाई थी। धर
भर रात बाकी थी कि उनकी नींद खुली! फिर घोड़े पर सवार हुए और भारे
चले । दिन निरुछते-निकलते उन्हें एक पहाड़ फे नजदीछ एक फ़ीन मिरी।
आपने समझा, तुझी की फाज है। विएझाफर योछे--झा पहुँचे थरा पढे
अरे यारो ठीडो । स्वाजासाइव के कटम धों-धौकर पी चो, साज सवार |

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