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ले चछे । थानेदार मे श्राज़ाद को देखा तो बोढे-+भादए मिरजासाहब,
- बहुत दिनों के बाद श्राप नज़र भाएं। आज भाप कहाँ भूछ पढ़े ?
क्ाज़ाद--क्या मरे हुएु से द्व्लेगी करते हो .! हचालात से बाहर
निकाल दो तो मजा दिखाऊँं। इसवक्त्‌ जो चाहो कट्ठ लो, मगर इजलांस
पर सारी कृलई खोल हँगा। जिध जिस भादमी से तुमने रिश्वत छी है,
उनको पेश करूँगा, भाग कर जाओगे कहाँ ?
थानेदार--रस्पी जल गई, मगर रस्सी का थक न गया | हे
के 5

' हुस्मशधारावेगम का मिजाज तो अच्छा है ? , , ३
८० आज़ाद-कथा
आजाद तो डोंगे मार रहे थे और चग्डूबाज़ को, चण्डू की,घुन सवार
थी । बोले--भरे यारो, जरी चण्दू त्लिकूंवा ,दो भाई ! आखिर इतने
आदमियों में कोई घण्डूबाज़ भी हैं, ' या सब-फें सब रूखे ही हैं )
* धानेदांर-अगर आज चण्डू न मिले तो क्या हो) + ५
ला ह
जे ब्न+
चण्डूवाज़-मर जायें, और वया हो, १६; |, ;
थानेदार--प्रच्छा देखें, केसे मरते हो १ 'कोई श्त्ते बदता है? हम
कहते हैं कि अगर इसको चण्डू न मिले तो यह मर जाय।*
इंस्पेक्टर -और हम ऋहते है कि यह कभी न मरेगा ।,
“चण्ड्वाज़--वाह री तऊुदीर, समझे थे, अरू।रज्खी के यहाँ अन्न चैत
करेंगे, चैव तो रद्दा दूर, किस्मत वहाँ लेआई।._* ;
थानेदार--अलारक्खो कौन १ चढ़ बता दो, तो अभो चंण्हू सेंगा हूँ ।
चम्हूबाज़-साइव; एक औरत है जो सराय में रहती थी ।
अन्र सुनिए, शाम के वक्त सुरैयावेगम बन-ठनकर बैठी आज़ाद
की इतजार कर रही धी। मगर भ्रीजाद तो हवाछात में,थे। यहाँ आता
कौंत । भ्ब्वासी को प्राजाद के ग्रिरफ्तार होने क्री ख़बर “तो,मिल गई,
सगर उसने सुरेयावेगम से कहा सहीं।._, म
हु पु किमनमन्‍मनम-मम-ममनन-«ऊमननमनभ»भ33 5७283 )
7 हर री ते $
,. पंसठवों परिच्छेद .. . :...
शहजादा हुमायं फ़र कई मदीनेल्तक | नेपाल की तराई में “शिक्वार
खेझकर छोटे, दो . हुस्बआरा की गहरी श्रच्चासी क्रो घुलवा भेजा।
शअ्रब्वासी ने शहजादा के आने की खबरें सुनो वो चमकती हुईं ओई 3
शहनादे ने देखा तो कडक गए + -बोले-आइए, वीमहरीःछ! हब,
जे कत तल >
आज़ाद-करपा ५८१
श्रब्यासी--हां, हुजूर। ह
शहजादा--भौर दुसरी बन ? उनका नाम तो हम भूछ गए ।
अब्यासी -बेशक, उनका नास तो श्राप जरूर ही भूछ गए होंगे।
कोठे पर से ध्वप में आईना दिखाए, घुरा-घुरी करें शोर लोगों हे
5&--बंडी बहन - ज्यादा इसीन हैं या छोरी $ है ताज्ुब की यात
किनहीं+ , -
शहजादा--हमें तो तुम हसीन माछूम होती हो।
भव्रासी--ऐं हुजूर, हम गरीब आदेसी, सला हमें कौन एछता है ?
' शहजादा-उसारे घर पड़ जाओं। '
अड्यासी--हुजूर तो मुझे शर्मिन्दा करते है। अ्रव्क्ाह जानता है,
क्या मिजाज पाया है ! यही एँसना-बोरूना रह जाता है हुज्ूर !
शहज़ादा--भष किसी तरकीतग से छे चलो।
अव्यासी --हुज़र भला में केसे ले चछूँ ! रहेसों का घर, शरीफों
की बहू-ब्रेटियों में पराए सद का क्‍या काम ।
शहजाद।--कोई तरकीव सोचो, आखिर किप्त दिन क्वाम श्राओगी १
अञ्चासी -आज तो किसी तरह सुसक्िन नहीं। श्राज एक मि्त
आनिवादी हैं. मं ह ।
शहजादा--फि९ फिसी तरकीब से सुझे वहाँ पहुँचा दो। श्राज तो
आँखें सेकने का खूब मौका है ४
अव्वासती-+अच्छा, एक तद॒बीर हैं । आज बाग ही में चैदक होगी
आप चक्कर किसी दरण्त पर बैठ रहे ।.* * 47 ५
शहजूादा--नहीं भाई, यह हमें पसन्द नहीं । कोई देख ले तो नाहक
उहहूं बन्तूं । बस, तुम बागबान को गाँठ को । यही एक'तद॒बीर है ।
श्र्यासी ने जाकर माली को छालूच दिया । कट्टा--अगर शहजांदा

ज८रे आज्ाद-कथा
को अन्दर पहुँचा दो तो दो अशफियाँ इनाम दिलवाऊ- साली राजी हो
गया। सब अव्यासी ने आकर शहजाई से कहा--छीजिए हजरत, फवह
है ! मगर देखिए, धोती और मीरजाई पहननी पढेगी और, मारे ऋषरे
की भद्दी-पी टोपी दीमिए, तत्र वहाँ पहुँच पाहएगा । है
£ शाम को हुमागूँफर ने माली का वेप बनाया ओर साली के साथ
बाग में पहुँचे तो देखा कि बाय के बीचोबोच एक पक़्का ओर ऊँचा
चबतरा है और चारों बहने कुर्सियों पर बैठी मिस फैरिंगटन से बातें
कर रही हैं । माली ये फूर्लों का एक गुलदस्ता बनाकर दिया और क्हा--
जाकर मेम पर रख दो । हुमाप्न फर ने .सिख खाहब को कुकर सलाम
किया ओर एक कोने में चुपचाप खड़े हो गए ।
घ्िपन्आरा -हीरा-हीरा, यह कौन है ?
हीरा-हुज़ूर, गुलाम है आपका | मैरा भाउजा है।
सिपहआरा-क्या नास है ) न्‍
होरा-लोग हुमायँ कहते हैं हुज़ूर !
सिपहश्नारा -आद्मी तो सलीकेदार माहूम होता है । अरे हुमाएूं,
थोड़ेसे फूछ तोड़ के और सदरौ को दे दे कि मेरे सिरहाने रख दे ।
शहजादा ने फूछ तोड़कर महरी को दिए. ओर फूलों के लाथ
रूमाल में एक रुका बाँध दिया । खत का सजमून यह था
£ मेरी जान, (
अब सब्र की ताकर नहों । अगर जिलाना हो तो जिला लो, बरना
कोई हिकमत काम न आएगी ।
घ | हुमाग़ँ फर ”
जब शहजादा हुमाग्न फ़र चले गए तो सिपहआरा ने माली से
कहा 5अपने भाग्जे को नौकर रख लो | ' ५.
आज़ाद-कंधा दर
, माली--हुज्र, सरकार ही हवा नमक तो खाता है ! यों भी नौकर है
दो भी नाकर है ।
विपहमारा-मगर इमायँ तो मुसलमानों का नाम होता है ।.
नाछी-हाँ हुजूर, पह मुसलमान हो गया है ।
/ दुश्चरे दिव शाम फो सितश्मार और हुस्तआरा बाग से भाई तो
देखा, घउत्ते पर शतरंज के दो नफशे खिंचे हुए हैं ।
सिपह भारा-फछ तक तो ये नऊझशे नहीं थे। शरद्वाहा, हम समझ
गए हुमाय़ँ माली ने बनाए होंगे ।
माछी--ड्वाँ हुज़ूए, उप्ती ने यनाया है । '
' सिपलओआरा --बहन, जग्म जाने कि लकशा हलक कर दो ।
हुस्तशरा-बहुत टेढ़ा नकशा है। इसका हल करना सुशकिल है ।

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