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भुठपुरे बक्त हुमायू हीरा के साथ बाग से पहुँचे। यहाँ हीरा ने दोनों
'इनों के लिखे हुए शेर हुमामू फर को दिखाएं। अभी वद्द पढ़ ही रहे थे फि
स्वथरा बाग में शा गई और हीरा को छु डा कर कह। --तुम्दारा भाँजा छाया *
दवीरा--हाजिर है हुजूर !
हुस्नश्लारा--चुलाओ ।
हुमायूँ ने आकर सलाम किया और गरदन भुफा लछी।
हुस्वआरा--तुम्दारा क्या नाम है जी !
हुमाग्नं--हुमाश्नं ।
हुस्तश्ारा--क्यों साहव, महान कहाँ ऐ ?
धर
हुमाश्ू-- -,
” घर-बार से क्या फकौर को काम; -
क्या लीजिए छोड़े गाँव का नाम ९
हुस्मआरा--अख्खाह, श्रापशायर सी हैं ,._*
हुमामूं --हुज्लूर, कुछ बक लेता, हूँ ।-
हुष्वश्मारा--कुछ सुनाओ । है ह
हुमाप्र--हुस्म दो तो जमीन पर बैठ जाऊँ ।
लिपहश्रारा-बड़े गुप्ताख दो तुम! कहीं नोकर हो ? -
८८ आज़ाद-कंधा
हुमाप्नं -+जी हाँ हुजूर, श्राजकर शहजआदा हुमायूं फर की बहन
के यहाँ नौकर हूँ । बे
इतने में बड़ी वेगम आ,गईं। हुसायूं फर मारे खौफ के भाग गए।
_ हा;
६ / कजज----न+ आप
लियासठवों परिच्छेद
सुरैयाबेगम ने श्राज़ाद मिरजा के, केद होने की ख़बर सुनी तो दिल
पर बिजली-सी 'गिर पड़ी। पहले तो यकीन न श्राया, सगर जब खबर
१;॒
। ड़ प्र
सच्ची शिक॒ली तो हाय-हाय करने छगी । .. . '
, अव्यासी -हुज्ञर, कुछ सममभ में नहीं आया। मगर उनके एक
अज्ञीज़ हैं। वह पैरवी करनेवाले हैं । रुपए भी खर्च करेंगे। :
सुरैयावेगप्र+रुपया निगोड़ा क्या चीज़ है। तुम जाकर कहो जितने
रुपयों की जरूरत हो, हमसे छ ।7, ' ?), .- «. 7. * ह
अब्यासी झाज़ाद मिरजा के चचा के पाप जाकर बोलो--बेगम साहब
ने सुके आपके पास भेजा है और कहा है कि रुपए की ज़रूरत हो तो हम
ट्वाज़िर हैं। जितने रुपए कहिए, सेन दें क्य
यह बडे मिरजा आजाद ले भी बढ़कर चगड़ेबाज़ थे। सुरैयावेगम के पास
आकर बोसे--क्या कहूँ बेममसाहब, सेरी, तो इज़्जव खाक में सिल्क गहठे।
सुरैयावेगप्त -या मेरे अह्ठाड, यह क्या गाज़वे हो गया ।
बडे मिरजा--क्या करूँ, सारा ज़माना तो उनका दुश्मन है | पुलीस
से अदावत, अमलों से तकरार । मेरे पास इतने रुपए कहाँ कि पेरवी करूँ।
वकील बगैर लिए-दिए मानते नहीं । जान अ्रज़ाब में है
सुरैयावेगम--इसकी तो श्राप फिक्र ही न करें। सब बन्ढोवस्वर हो
जायगा । सौ-दो सी, जो कहिए हाजिर है। 7
आज़ाद-कथा ज८५
बड़े मिरआा-+फोजदारी के मुकदमे में ऊँचे वक्कील जरा लेते वहुत हैं ।
में कछ एफ -बारिस्टर के पास गया था। उन्होंने कहा कि एक पेसी के
दो सी ढूँगा। अगर आप चार सौ रुपए दे दें तो उस्मेद है कि शाम तक
झाजाद तुम्हारे पास आा जाये। ९
वेगप्रसाहत् ने चार सी रुपए दिछवा द्विए | यढ़े मिसजा रुपए लेकर
चाहर गए शोर थोड़ी देर के बाद आफर एक चारपाई पर घम से गिर
पढ़े ओर बोले - आज तो इज्जत ही गई थी, मगर खुदा ने घचा लिया 7
में जो यहाँसे गया तो एक माहइब मे भाकर कट्टा--आजाद सिरजा को
धानेदार दथकट़ी पहनाकर चोक से छे जायया। बस, मैंने अपना सिर
पीर लिया। इसिफ़ाक से एक रिखारूदार मिल गएु। उन्होंने मेरी यह्द
हालत ढेखी ती कट्टा--दो सी रुपए दो तो पुलीसवालछों फी गाँठ छेँ।
मैंते फोरन ठो सौ रुपए निकालूफर उनके हाथ पर रज्खे | अप दो ता और
दिखछिवाहएु तो वकीलों के पाठ जाऊँ । ग्रेगम ने दो सी रुपए औ्रौर दिछूवा
दिए। बड़े मिरजा दिल में ख़ुश हुए, अच्छा शिकार फ़रेसा | रुपए छेकर
चलते हुए ।
इधर सुरेयावेगम रो-रोकर श्राँखें फोड़े डालती थीं,मह रियाँ समरातीं,
दिन रात रोने से क्या फायदा, अठ्छाह पर' भरोसा रखिए, उछकी मर्जी
हुई तो श्राजाद मिरजा दो-चार दिन में धर झआावेंगे। मगर थे नसीदतें
वेगससाहब पर कुछ असर नःकरती०थ | एफ दिन एक महरो ने
आकर कहा--हुज्ूर, एक जोरत 'डयोढी पर खड़ी हे। कहिए तो छुल्लार्ज !
बेगम ने कहा-घुछा लो। वह औरत परदा उठाकर आँगन में दाखिल
हुई और क्रुकंसर बेगम को 'सछाम किया। उसकी समधज सारी
दुनिया की क्षीरतों से निराली थी। गुलूबदव का झुस्त पाजासा,'बॉका
अमामा, सखमरू का दुगछा, उस पर हऊुका कारचोबी को काम,, हाथ में
5२० ख्राजाद-कथा
आवन व का पिंजड़ा; उसमें एक चिड़िया बैठी हुईं। सारा'घः उच्ती का
ओर देखने लगा | सब-की-सब दड़ थीं कि या खुदा, यह उठती. जवानी,"
गुराब-सा र॒गं, और यों गली-छूचों की सैर करती फिरे ! अब्बाप्ती
बोली->स्यों बीवी, तुम्हारा मक्कान कहाँ है? और यह पहनावा क्रिप्त
मुल्क का है ? तुम्हारा नास क्या है बीबी ? 0 के
आरत--हमारा घर मन-चके जवानों का दिल , है ओर
नाम साशूक । ' *
'- यह कहकर उथने पिंजडा सामने रख दिया ओर ये। चहकने
लूगी--हुजूर, आपको यकीन न आएगा, कछ मे परिस्तान में बैठी, वहाँ
की सेर देख रही थी ह्लि पहाड़ पर बड़े जोरों की आँधी आई ओर
इतनी यह उड़ी कि आसमान के नीचे एक और आसमान नजर आने
रूगा। इसके साथ ही घड़वडाहद की 'आवाज़ श्राई और एक उटत-
खोला आसमान से उतर पडा । हे
अ्रच्या पी--अरे उडनखटोला ! हसका जिक्र वो कहानियों में सुना
करते थे। हे
ओऔरत--बस हुज्र, उछ उड़नखठ छे में से एक सचमुच की परी
उतरी शरीर दम के दम में खटोझा गायब हो, गया। वह पर!, अप्तक्ल में
परी न थी, धह एक इसान था । मैं उसे दे क्षत्ते हो हज़ार जान से आशिक
हो गई । अरब सुना है कि वह बेचारा कही कद, हो गया है ।
सुरैयावेगम्न-क्या, कैद है ! भला, उच जवान का नाम भी नुम्हे
भाछूतहै?! -
औरत--जी हों. हुजूर, मैने वूछ लिया है। उसे श्राजाद-कहते है।
सुरैयाबेगम--अरे ! यह तो कुछ धोर ही गुल घिला। झिसी ने तुम्हें
बहऊका तो नहीं दिया ? ] न
आज़ाइ-कंथा ण्ष्त
भोरत-दुज़ूर, बढ आपके यहाँ भी आए थे। जाप भी उन पर
रीकी हुई दे )
सुरैयावेगम -भुमे तो तुम्दारी सर बातें दीवानों को बककररू माक्ू
ट्ोती हैं। कहाँ परी, कहाँ श्राज़ाद, कहाँ उडनखदोला ! समझ में को

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