लेफ्टिनेंट जनरल अजय सिंह बने अंडमान निकोबार कमान के कमांडर इन चीफ, दे चुके हैं सेना की सभी कमांड में सेवाएं

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<p style="text-align: justify;">लेफ्टिनेंट जनरल अजय सिंह सोमवार यानी आज अंडमान निकोबार कमान के कमांडर इन चीफ का पद संभालने जा रहे हैं. इसके साथ की एक नया कीर्तिमान भी बनने जा रहे हैं. दरअसल देश में शायद पहली बार ऐसा होगा कि कोई पांचवी पीढ़ी का कैवेलरी (टैंक) ऑफिसर इतने उंचे ओहदे पर पहुंचेगा. बता दे कि &nbsp;लेफ्टिनेंट जनरल अजय सिंह के परिवार में सेना की कैवेलरी यूनिट में तैनात होने का सिलसिला 19 सदी से चला आ रहा है. 1858 में उनके पड़-दादा के पिता, रिसालदार-मेजर मलूक सिंह अहलावात ब्रिटिश इंडियन आर्मी की बंगाल-कैवलरी यूनिट में शामिल हुए थे.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>&nbsp;</strong><strong>लेफ्टिनेंट अजय सिंह सेना मुख्यालय में डीजी</strong><strong>, </strong><strong>मिलिट्री ट्रेनिंग के पद पर थे</strong></p>
<p style="text-align: justify;">लेफ्टिनेंट अजय सिंह फिलहाल सेना मुख्यालय में डीजी, मिलिट्री ट्रेनिंग के पद पर तैनात थे. वे अंडमान निकोबार कमान के कमांडर इन चीफ, लेफ्टिनेंट जनरल मनोज पांडे की जगह ले रहे हैं जो सोमवार को सेना की कोलकता (‘फोर्ट विलियम’) स्थित पूर्वी कमांड की कमान संभालेंगे.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>37</strong><strong> साल के करियर में सभी कमांड में सेवाएं दे चुके हैं अजय सिंह</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अजय सिंह सेना की 81 आर्मर्ड (कैवलरी) रेजीमेंट से ताल्लुक रखते हैं. खास&zwnj; बात ये है की 37 साल के करियर में वे सेना की सभी कमांड में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्होनें सेना के लिए तीन अहम ‘स्टडी’ में भी योगदान दिया है. पहली ‘लैंड वॉरफेयर डॉक्ट्रिन’, दूसरी ‘आर्मी हेडक्वार्टर रि-ऑर्गेनाइजेशन’ और तीसरी एक ऑपरेशनल स्टडी है जिसे क्लासीफाइड रखा गया है. वे फिलहाल ‘चीन-पाकिस्तान और सीपीईसी’ पर पीएचडी भी कर रहे हैं.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अजय&zwnj; सिंह के पिता</strong><strong> ने</strong><strong>&nbsp;81</strong><strong> आर्मर्ड रेजीमेंट की स्थापना की थी</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जानकारी के मुताबिक, अजय&zwnj; सिंह के पिता, ब्रिगेडियर एन पी सिंह&nbsp; ने 1973 में 81 आर्मर्ड रेजीमेंट की स्थापना की थी. उस वक्त इस रेजीमेंट को डेक्कन हॉर्स के नाम से जाना जाता था. अजय सिंह के दादा, ब्रिगेडियर (कर्नल) कदम सिंह अहलावत ने 1936 में सेना की पूना हॉर्स रेजीमेंट ज्वाइन की थी. वे 1962 के युद्ध में पूर्वी लद्दाख में तैनात थे. लेकिन एकलेमेटाइज किए बगैर वे दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) पहुंचे गए थे, जि&zwnj;सके चलते उन्हें वहां हार्ट-अटैक आ गया था. इस गुस्ताखी के लिए उनका डिमोशन भी कर दिया गया था.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;बता दें कि आधुनिक युद्ध-क्षेत्र में टैंकों ने सेना की हॉर्स यानि घोड़ों की जगह ली थी. इसलिए टैंक यानि आर्मर्ड रेजीमेंट्स को आज भी कैवलरी का नाम दिया जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अजय सिंह के परदादा ने तीसरे अफगान युद्ध मे् हिस्सा लिया था</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अजय सिंह के परदादा, रिसालदार मेजर राज सिंह अहलावत 1901 में ब्रिटिश सेना की स्किनर हॉर्स रेजीमेंट में शामिल हुए थे और उन्होंने तीसरे अफगान युद्ध मे् हिस्सा लिया था. राज सिंह अहलावत के पिता यानि अजय सिंह के पर-दादा के पिता, मलूक सिंह अहलावत 1858 में ब्रिटिश सेना की बंगाल कैवलरी (बाद में ‘स्किनर हॉर्स’)शामिल हुए थे और सैनिकों के विद्रोह को कुचलने के लिए अवध और बुंदेलखंड के ऑपरेशन्स में शामिल हुए थे.</p>
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